इंटरव्यू: याकूब को मुस्लिम कहने वाले 'आतंक का धर्म' तय कर रहे हैं- निकम
मुंबई/नागपुर. याकूब की फांसी पर सियासत चमकाई जा रही है। धर्म के नाम पर फांसी दिए जाने के तर्क गढ़े जा रहे हैं। इनमें सियासी दल तो हैं ही, कई नामी वकील भी हैं। रिटायर्ड जज से लेकर रॉ के पूर्व अफसर भी हैं। फांसी पर उठने वाले हर सवाल का जवाब दे रहा है भास्कर...याकूब के केस से सबसे ज्यादा जुड़े रहे वरिष्ठ वकील उज्जवल निकम के जरिये।
>शकील ने एक इंटरव्यू में आपको भी धमकाया है?
ऐसे आतंकियों, अपराधियों का महिमामंडन नहीं होना चाहिए। ऐसे लोगों का इंटरव्यू लेने, छापने और दिखाने से उनका ग्लोरीफिकेशन होता है। हर गुंडा चाहता है कि समाज में उसका खौफ पैदा हो। इसके लिए मीडिया एक अच्छा प्लेटफॉर्म है। देश के बाहर जाकर जो गुनहगार ऐसी बातें करे, उस पर ध्यान ही नहीं देना चाहिए। जो शख्स याकूब की फांसी को कानूनी कत्ल कह रहा है, वो भला क्या कानून और कानून के रखवालों को पूजेगा? धमकी ही देगा।
>फांसी पर बहस क्यों छिड़ी है?
वर्षों तक फांसी टालते रहने से ही ऐसी बहस छिड़ती है। ये गलत परंपरा है। मीडिया, सियासी दलों, प्रबुद्धवर्ग को इस पर मंथन करना चाहिए। ये परंपरा कानून, न्यायपालिका पर भरोसे को कम करेगी। होना यही चाहिए कि जिसने अपराध किया, उसे सजा मिल गई।
>याकूब मुस्लिम है इसलिए फांसी हुई?
कानून सिर्फ गुनाह देखता है, धर्म नहीं। जो ऐसी बातों को बढ़ावा दे रहे हैं, वो देश की धर्मनिरपेक्षता को धोखा दे रहे हैं। आतंक का धर्म नहीं होता। याकूब को मुस्लिम प्रचारित कर ये आतंक का धर्म ही तो तय कर रहे हैं।
कानून सिर्फ गुनाह देखता है, धर्म नहीं। जो ऐसी बातों को बढ़ावा दे रहे हैं, वो देश की धर्मनिरपेक्षता को धोखा दे रहे हैं। आतंक का धर्म नहीं होता। याकूब को मुस्लिम प्रचारित कर ये आतंक का धर्म ही तो तय कर रहे हैं।
>राजीव के हत्यारों को तो फांसी नहीं हुई?
बरसों तक दया याचिकाएं अटके रहने से ही राजीव के हत्यारों की फांसी आजीवन कारावास में बदल गई। संविधान में बदलाव होना चाहिए। ताकि राष्ट्रपति तीन महीने में फैसला ले सकें। वर्ना याचिका स्वत: रद्द।
बरसों तक दया याचिकाएं अटके रहने से ही राजीव के हत्यारों की फांसी आजीवन कारावास में बदल गई। संविधान में बदलाव होना चाहिए। ताकि राष्ट्रपति तीन महीने में फैसला ले सकें। वर्ना याचिका स्वत: रद्द।
>आधी रात को सुप्रीम कोर्ट क्यों खुली?
फांसी की तारीख सामने आते ही मीडिया में बहस छिड़ गई। देश में ऐसा माहौल बन गया कि जांच एजेंसी, प्रॉसीक्यूशन और अदालत के फैसले पर सवाल उठने लगे। न्याय की बुनियाद ये है कि न्याय न केवल दिखना चाहिए, बल्कि महसूस भी होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी शायद यही सोचा होगा, इसलिए ये कदम उठाया।
>दुनिया में क्या संदेश गया इससे?
फैसले से देश ने दिखा दिया कि हमारे यहां न्याय के दरवाजे 24 घंटे खुले रहते हैं। आतंकी के लिए भी आधी रात को न्याय मांगा जा सकता है। ये बड़ा कदम है।
फैसले से देश ने दिखा दिया कि हमारे यहां न्याय के दरवाजे 24 घंटे खुले रहते हैं। आतंकी के लिए भी आधी रात को न्याय मांगा जा सकता है। ये बड़ा कदम है।
>क्या भविष्य में दूसरे केस में भी ऐसा होगा?
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से कानून की कई खामियां और कमियां दूर हो गईं। अब बार-बार कोई दया याचिका नहीं लगा सकेगा। यह भी व्यवस्था हो गई कि पहली बार दया याचिका खारिज होने पर 14 दिन में डेथ वारंट जारी किया जा सकता है।
>कहा जा रहा है कि उसने सरेंडर किया था?
तो? क्या इससे उसका गुनाह कम हो गया? यदि दाउद भारत आएगा और शर्तों के साथ सरेंडर करेगा कि माफ कर दो, फांसी मत दो। तो भी कानून बर्दाश्त नहीं करेगा। वैसे भी, 14 साल सुनवाई चली। एक बार भी उसने नहीं कहा कि वो सरेंडर हुआ था। क्यों नहीं उसने सबूत दिए?
तो? क्या इससे उसका गुनाह कम हो गया? यदि दाउद भारत आएगा और शर्तों के साथ सरेंडर करेगा कि माफ कर दो, फांसी मत दो। तो भी कानून बर्दाश्त नहीं करेगा। वैसे भी, 14 साल सुनवाई चली। एक बार भी उसने नहीं कहा कि वो सरेंडर हुआ था। क्यों नहीं उसने सबूत दिए?
>लेकिन धमाके याकूब ने तो नहीं किए?
टाडा कोर्ट ने 12 को फांसी की सजा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट ने बम प्लांट करने वाले 11 की फांसी उम्रकैद में बदल दी। सिर्फ साजिश रचने वाले याकूब की सजा बरकरार रखी। बम रखने वाले 11 लोग इसे काला साबुन ही कहते थे। लेकिन याकूब को पता था कि कितना विध्वंस मचेगा। उसका गुनाह ज्यादा गंभीर था।
टाडा कोर्ट ने 12 को फांसी की सजा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट ने बम प्लांट करने वाले 11 की फांसी उम्रकैद में बदल दी। सिर्फ साजिश रचने वाले याकूब की सजा बरकरार रखी। बम रखने वाले 11 लोग इसे काला साबुन ही कहते थे। लेकिन याकूब को पता था कि कितना विध्वंस मचेगा। उसका गुनाह ज्यादा गंभीर था।
>22 साल जेल में रहने के बाद फांसी क्यों?
ट्रायल खिंचने के लिए आरोपी ही जिम्मेदार है। ब्लास्ट में 257 लोग मरे। 123 अभियुक्तों के वकीलों ने एक भी पीएम नोट, इंज्यूर सर्टिफिकेट स्वीकार नहीं किया। हर एक केस में डॉक्टरों, सर्वेयरों को पेश करना पड़ा। 123 में से 100 आरोपियों को सजा हुई। इनमें संजय दत्त भी है।
ट्रायल खिंचने के लिए आरोपी ही जिम्मेदार है। ब्लास्ट में 257 लोग मरे। 123 अभियुक्तों के वकीलों ने एक भी पीएम नोट, इंज्यूर सर्टिफिकेट स्वीकार नहीं किया। हर एक केस में डॉक्टरों, सर्वेयरों को पेश करना पड़ा। 123 में से 100 आरोपियों को सजा हुई। इनमें संजय दत्त भी है।
>वो टाइगर का भाई था, इसीलिए फांसी दी?
बिलकुल गलत। याकूब बम धमाकों की साजिश के लिए दुबई में हुई पहली बैठक में शामिल था। सीए होने की वजह से ऑपरेशन में पैसे की जिम्मेदारी उसी ने संभाली थी। मुंबई से दुबई और दुबई से पाकिस्तान की यात्रा का पैसा उसने जुटाया था। दूसरी बात, साजिशकर्ता साजिश करते हैं तो उनमें नंबर-1, नंबर-2 नहीं होते। साजिश के लिए सभी बराबर जिम्मेदार होते हैं।
बिलकुल गलत। याकूब बम धमाकों की साजिश के लिए दुबई में हुई पहली बैठक में शामिल था। सीए होने की वजह से ऑपरेशन में पैसे की जिम्मेदारी उसी ने संभाली थी। मुंबई से दुबई और दुबई से पाकिस्तान की यात्रा का पैसा उसने जुटाया था। दूसरी बात, साजिशकर्ता साजिश करते हैं तो उनमें नंबर-1, नंबर-2 नहीं होते। साजिश के लिए सभी बराबर जिम्मेदार होते हैं।
क्या फांसी मुंबई हमलों का बदला है?
नहीं। यह एक व्यक्ति को फांसी नहीं है। यह एक प्रवृत्ति को फांसी है। फांसी का मतलब उस गुनहगार को सजा नहीं बल्कि समाज में ऐसे गुनाह के प्रति खौफ पैदा करना मकसद होता है।
नहीं। यह एक व्यक्ति को फांसी नहीं है। यह एक प्रवृत्ति को फांसी है। फांसी का मतलब उस गुनहगार को सजा नहीं बल्कि समाज में ऐसे गुनाह के प्रति खौफ पैदा करना मकसद होता है।
>बहस चल रही है कि फांसी की सजा खत्म होनी चाहिए?
हमारे देश में फांसी हर गंभीर गुनाह या हत्या में भी नहीं होती। केवल रेअरेस्ट ऑफ रेयर क्राइम में ऐसा होता है। लेकिन फांसी की सजा में देरी होने से इसका असर नहीं होता। अपराधी के मन में कुछ तो डर होना ही चाहिए।
हमारे देश में फांसी हर गंभीर गुनाह या हत्या में भी नहीं होती। केवल रेअरेस्ट ऑफ रेयर क्राइम में ऐसा होता है। लेकिन फांसी की सजा में देरी होने से इसका असर नहीं होता। अपराधी के मन में कुछ तो डर होना ही चाहिए।

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