Tuesday, 28 July 2015

युवाओं के लिए मेक इन इंडिया बड़ा मौका- एपीजे अब्दुल कलाम

युवाओं के लिए मेक इन इंडिया बड़ा मौका- एपीजे अब्दुल कलाम
हमारे पास वह सब कुछ है, जो हमें ऐसे राष्ट्र में रूपांतरित कर सकता है कि दुनिया के देशों में हम गर्व से सिर उठाकर चल सके। वैभव के शिखर पर जाने का रोडमैप क्या है? शोध, डिजाइन, विकास, उत्पादन और फिर सच्चे अर्थों में भारत में निर्मिति। यही है मैक इन इंडिया को साकार करने का अर्थ। हमारे पास ऐसी बौद्धिक क्षमता है कि जो चीज हमें दूसरे देश नहीं देते हम उन्हें विकसित कर लेते हैं। दुनिया के 15 बड़े निर्यातक देशों में मैन्यूफैक्चरिंग की सबसे कम लागत हमारे यहां है और उद्यमशीलता के मामले में हमारी बराबरी अमेरिका की सिलिकॉन वैली से होती है। जाहिर है नौजवानों के लिए व्यापक अवसर हैं। आइए इन क्षमताओं को विस्तार से जानें।

वर्ष 1975 में इसरो में हमें एक नया डिवाइस विकसित करने के लिए बेरिलियम डायफ्राम चाहिए था। आज आपको यह डायफ्राम ज्यादातर ऊंचे दर्जे के स्पीकर में दिखाई देगा, लेकिन चार दशक पहले कुछ ही देशों में ऐसे डायफ्राम बनाने की काबिलियत थी। हमने अमेरिका की एक कंपनी से संपर्क किया। कंपनी अच्छा ऑर्डर देखते हुए खुशी-खुशी राजी हो गई और कागजात तैयार कर लिए गए। जब हम लेन-देन पूरा करने ही वाले थे कि उनके एग्ज़ीक्यूटिव का फोन आया कि वे यह सौदा नहीं कर सकते। हमें पता चला कि अमेरिकी सरकार ने बिक्री रोक दी है, क्योंकि वही मटेरियल उनकी मिसाइलों में इस्तेमाल किया जाता था। चूंकि हमें डायफ्राम की बहुत जरूरत थी, हमने इसके बारे में जानना शुरू किया।

अमेरिका के बेरिलियम डायफ्राम जापान में बनी बेरिलियम छड़ों से बनते थे, जिन्हें प्रशांत महासागर के पार भेजा जाता था। फिर और भी चौंकाने वाली जानकारी मिली। बेरिलियम एक दुर्लभ तत्व है और मुट्ठीभर देशों के पास ही इसका कच्चा माल था। बेरिलियम के शीर्ष चार उत्पादकों में भारत भी था। तथ्य तो यह था कि बेरिलियम छड़ें बनाने वाली जापानी कंपनी ने कच्चा माल भारत से ही आयात किया था। हमें यह जानकर दुख हुआ कि एक ऐसा पदार्थ जिसका कच्चा माल खासतौर पर हमारे पास है, वहीं हमें देने से इनकार कर दिया गया। जल्दी ही शीर्ष चार शोध प्रयोगशालाओं की समिति बनाई गई और उसे बेरिलियम डायफ्राम भारत में बनाने की चुनौती दी गई। चार माह के वक्त में हमें कामयाबी मिल गई।

अगस्त 2014 में बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप ने दुनिया के विभिन्न देशों में उत्पादन की लागत की तुलना की, जिसमें श्रम लागत, बिजली और प्राकृतिक गैस जैसे तत्वों का ध्यान रखा गया था। हमने रिपोर्ट का विश्लेषण किया तो चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया। मसलन, दुनिया सबसे बड़ा निर्यातक चीन उत्पादन या मैन्यूफेक्चरिंग के लिए निर्यात की दृष्टि से 15वें स्थान पर मौजूद भारत की तुलना में 10 अधिक महंगा था। दूसरे और तीसरे सबसे बड़े निर्यातक क्रमश: जर्मनी व अमेरिका मैन्यूफेक्चरिंग के लिए क्रमश: 40 से 15 फीसदी महंगे थे।
वास्तविकता तो यह थी कि वे सभी 14 देश जो भारत से आगे थे उत्पादन के लिए भारत से महंगे थे और शीर्ष 25 निर्यातक देशों में 21वीं पायदान का इंडोनेशिया ही उत्पादन के मामले में भारत से सस्ता था। आदर्श स्थिति तो यही होनी चाहिए थी कि अंग्रेजी बोलने वाले सस्ते श्रम बल के साथ भारत विश्व अर्थव्यवस्था की उत्पादन व निर्यात राजधानी होनी चाहिए। ठीक चीन की तरह और उसी को वैश्विक माल की मात्रा व कीमतें तय करना चाहिए। इसमें तीन बाधाएं हैं- पहला तो भारत में बिज़नेस करने में आने वाली प्रक्रियागत कठिनाइयां (142वां स्थान), कमजोर आधारभूत ढांचा खासौतर पर सड़कें ( 59वां स्थान) और नीतिगत मुद्दे व भ्रष्टाचार (85वां स्थान)।

नवंबर 2014 की शुरुआत में हम चीन गए, जहां हमने उनकी सफलता और उनके लिए भीतर से मौजूद खतरों को समझने का प्रयास किया- खासतौर पर युवा छात्रों के दृष्टिकोण से। तीन चीजें उभरकर सामने आई। पहला व उजला पहलू कि चीन की एडवान्स प्लानिंग बहुत अच्छी है। विज़न केंद्रीय स्तर पर तय किया जाता है और प्रशासन के एकदम निचले स्तर शुरुआत कर माइक्रो प्लान विकसित किए जाते हैं। प्रत्येक प्रशासनिक इकाई को लक्ष्य दिया जाता है और उसी से यह तय होता है कि उन्हें हटाया जाएगा या पदोन्नति मिलेगी। दूसरा थोड़ा अंधेरा पहलू यह है कि चीन उन प्रमुख शहरों में होते पर्यावरण नुकसान के दबाव में परेशान है, जिनकी संख्या बहुत बढ़ गई है।
हाल की आर्थिक दौलत ने उन्हें ऊर्जा की ऊंची खपत और प्रदूषण फैलाने वाला बना दिया है। पिछले दो दशकों की एक बच्चे की नीति भी श्रम बल की कमी के रूप में सामने आई है। श्रम बल की प्रमुखता वाला कोई भी बिज़नेस प्लान सरसरीतौर पर खारिज कर दिया जाता है (चीन में हर बिज़नेस प्लान को सरकारी मंजूरी लगती है)। तीसरा, चीन तथा उसकी कम्युनिस्ट सरकार देख रहे हैं कि इनोवेटिव डिज़ाइनिंग व आइडिया के क्षेत्र में एकदम खालीपन आ गया है।
मौजूदा चीजों को चुनौती देने के लिए इनोवेशन तो अपरिहार्य है, लेकिन यह सरकारी की कार्यशैली के ठीक विपरीत होता है। हम जिन युवाओं से मिले उनमें यही प्रमुख चिंता थी। अक्टूबर 2014 में हमारे प्रधानमंत्री ने ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान किया। यह संकल्प और उसे उद्योग जगत से मिले उत्साहवर्द्धक प्रतिसाद के मामले में इसकी तुलना सिर्फ 1990 के दशक में प्रधानमंत्री नरसिंह राव के उदारीकरण के आह्वान से ही की जा सकती है।

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